210502 : The Magic Number
वैसे तो भाग्य या 'किस्मत' जैसे शब्द को किसी एक परिभाषा में नहीं बाँधा जा सकता।
कहने वाले अक्सर कह देते हैं कि जो परम-शक्ति ने लिख दिया है, वही होना है; आपके हाथ-पैर मारने से कुछ बदलने वाला नहीं। जैसा कि कबीर दास जी की उलटबांसी या साखियों का भाव हमें समझाता है:
"चिंता ताकी कीजिए, जो अनहोनी होय।
अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय॥"
इसके ठीक उलट एक दूसरा पक्ष भी है—जो किसी अदृश्य शक्ति या लकीरों में बिल्कुल यकीन नहीं रखता। जिसका मानना है कि यह समूचा संसार एक 'रैंडम' सिलसिले पर चल रहा है; यहाँ किसी अलौकिक शक्ति का कोई हस्तक्षेप नहीं। यह वह तबका है जो केवल और केवल श्रम को पूजता है और फ़िराक़ गोरखपुरी के इस अंदाज़ में जीता है:
"हमसे पूछो ज़ब्त-ए-इश्क़ की बातें,
हमने तक़दीर को तदबीर से बदलते देखा है।"
लेकिन विश्वास, आस्था, अंधविश्वास, कर्म और 'हाथ की लकीरों' की इस अंतहीन बहस को अगर थोड़ी देर के लिए दरकिनार कर दें, तो एक ऐसा कड़वा गुणांक (Factor) सामने आता है जिस पर हमारा ज़ोर नहीं चलता—हमारा पिन-कोड (PIN-Code)।
साधारण शब्दों में कहें तो हमारे जन्म और घर का पता।
यही वह छह अंकों की संख्या है जो यह तय करती है कि हमारा दायरा क्या होगा, हमारी भाषा कौन सी होगी, हमारे खेल के मैदान कैसे होंगे, हमारे यार-दोस्त कैसे मिलेंगे, हमारी शिक्षा का स्तर क्या होगा और परिवार की आर्थिक स्थिति किस करवट बैठेगी। यहाँ तक कि हमारे जीवन-साथी का चुनाव, हमारी रोज़मर्रा की साँसें और अक्सर हमारी मृत्यु का ढंग भी इसी पिन-कोड से तय होता है।
ज़रा कल्पना कीजिए—एक ही तारीख़, एक ही घड़ी और एक ही पल में जन्मे दो बच्चों की।
एक पैदा हुआ अमेरिका के न्यू जर्सी में, और दूसरा हमारे बीहड़ों और सूखी ज़मीनों वाले बुंदेलखंड के किसी दूरदराज़ गाँव में।
न्यू जर्सी में जन्मे बच्चे के लिए एक वैज्ञानिक, बड़ा उद्योगपति या अंतरराष्ट्रीय स्तर का रचनाकार बनने की संभावना उतनी ही आसान और सुलभ है, जितनी किसी अँधेरे कमरे में टॉर्च या दीवार के स्विच से रोशनी ढूँढ लेना।
दूसरी तरफ़, बुंदेलखंड की धूल और तंगियों में जन्मा वह बालक... उसके लिए उसी मुक़ाम तक पहुँचना किसी काल-कोठरी में हाथ-पाँव मारकर माचिस की तीली तलाशने जैसा है।
दिल्ली या किसी बड़े महानगर के किसी आधुनिक स्कूल में दाखिला लेते समय छात्र के सामने दर्जनों विषयों और रुचियों का खुला आसमान होता है। लेकिन हमारे कस्बों और देहातों में कक्षा 6 का बच्चा भी यह जानता है कि उसकी रुचि चाहे जिस चीज़ में हो, मजबूरी में उसे वही गिने-चुने विषय रटने होंगे जो स्कूल में उपलब्ध हैं। क्या पता उस बच्चे की उँगलियों में शब्दों को जादू बना देने की वह सहज प्रतिभा छिपी हो, जो शायद मुंशी प्रेमचंद के शुरुआती दिनों में भी न रही हो! लेकिन विडंबना देखिए—हमारे यहाँ प्रतिभा भूगोल की बंधक बनकर दम तोड़ देती है।
कोल्हू का बैल और पत्तों के नीचे दबी क़िस्मत
हमारे समाज में अक्सर कहा जाता है कि "मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।" लेकिन हक़ीक़त की ज़मीन पर पैर रखकर देखिए।
एक इंसान दिन-रात जागकर, कोल्हू का बैल बनकर, पसीने की हर बूँद निचोड़कर भी अपने पूरे जीवन में उतना हासिल नहीं कर पाता, जितना किसी मेट्रो सिटी के एक वातानुकूलित कमरे में बैठकर सिर्फ़ 50% मेहनत करने वाला व्यक्ति आसानी से कमा लेता है।
इस फ़र्क को अगर एक कहावत में पिरोना हो, तो सिर्फ़ इतना कह सकते हैं:
"महानगरों में क़िस्मत अक्सर किसी पेड़ के नर्म पत्ते के नीचे दबी होती है—हल्की सी हवा चली और मिल गई; जबकि हमारे देहातों और छोटे कस्बों में क़िस्मत किसी भारी, खुरदुरे पहाड़ी पत्थर के नीचे दबी है—जिसे हटाने में कई पीढ़ियाँ खप जाती हैं।"
यह पिन-कोड केवल आपके करियर का फैसला नहीं करता, यह आपकी नब्ज़ का फैसला भी करता है।
मान लीजिए रात के दो बजे किसी के सीने में अचानक तेज़ दर्द उठता है।
यदि उसका पिन-कोड किसी महानगर का है, तो जितने समय में वह आँखें मलता हुआ उठेगा, उतने समय में उसके दरवाज़े पर एडवांस्ड कार्डिएक एम्बुलेंस खड़ी होगी और पंद्रह मिनट में वह किसी मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल के ICU में होगा।
लेकिन वही दर्द अगर बुंदेलखंड के किसी अंदरूनी कस्बे या गाँव में उठे?
वहाँ एम्बुलेंस को फोन लगना और उसका मौके पर पहुँचना ही अपने-आप में एक चमत्कार है। फिर वह खटारा गाड़ी मरीज़ को लेकर किसी प्राथमिक केंद्र पहुँचेगी, जहाँ का डॉक्टर बिना छुए उसे सीधे 'ज़िला अस्पताल' के लिए रेफर कर देगा। ज़िला अस्पताल में स्ट्रेचर और ऑक्सीजन की जंग लड़ते-लड़ते वह इंसान उसी दर्द में दम तोड़ देता है—जहाँ अगर केवल समय और बुनियादी सुविधाएँ होतीं, तो वह शायद अगले बीस साल और जी जाता।
और हम? हम हाथ जोड़कर सिर झुका लेते हैं और कह देते हैं—"ऊपर वाले का बुलावा आ गया था, जब वक़्त पूरा होता है तो जाना ही पड़ता है।"
व्यवस्था और भूगोल की इस आपराधिक नाकामी को 'विधाता का विधान' कहकर पल्ला झाड़ लेना हमारी पुरानी आदत बन चुकी है।
सोच के कपाट खोलिए
यदि आप भी हर विसंगति और अभाव को विधाता की मर्जी मानकर संतुष्ट हो जाते हैं, तो शायद मेरा यह लिखना आपके लिए किसी काम का नहीं। यह तो बिल्कुल वैसा ही होगा जैसे किसी ऐसे व्यक्ति को हाथ पकड़कर सुरक्षित सड़क पार कराने की कोशिश करना, जो आपको ही लुटेरा समझकर झटक दे और ठोकरें खाते हुए उसी गड्ढे में गिरना अपनी नियति मान ले।
यह तुलनाएँ और कड़वे यथार्थ मैंने किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि हमारे दिमाग के उन ज़ंग लगे कपाटों को खोलने के लिए लिखे हैं जिन्हें हमने पुरानी और घिसी-पिटी सोच की ज़ंजीरों से जकड़ रखा है।
हम जब तक अपनी सामाजिक परिस्थितियों, भौगोलिक पिछड़ेपन और सुविधाओं के अभाव को खुले दिमाग से नहीं समझेंगे—तब तक हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी उसी 'किस्मत के खेल' का गुलाम बनाए रखेंगे।
क़िस्मत को दोष देना आसान है, लेकिन यह समझना कहीं अधिक ज़रूरी है कि कभी-कभी हमारी तक़दीर हमारे हाथों में नहीं, बल्कि हमारे डाकखाने के उस छह अंकों के पिन-कोड में अटकी होती है। और जब तक हम इस खाई को पाटने की ज़िद नहीं ठानेंगे, तब तक बुंदेलखंड का प्रेमचंद खेतों में हल चलाता रहेगा और न्यू जर्सी का आम बालक दुनिया पर राज करता रहेगा।


Outstanding bro keep it up high ✍🏻🔥🙌🏻🔝
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