2026 में 1926 (बदलती दुनिया में भारतीय गांव) [The Untouched India - A Travelogue] Part-1

 «बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना» — यह कहावत जो मैंने बचपन में सुनी थी, आज उस शादी में मैं अब्दुल्ला के किरदार में था; क्योंकि शादी थी मेरे मित्र के मित्र आयुष सिंह की, जिससे मैं सिर्फ़ तीन घंटे ही मिला था। आज मैं उसकी शादी में जा रहा था, लगभग 900 किलोमीटर दूर। अब समझिए कितनी दूरी, पहले रिश्ते की और उसके बाद  मील की। मन में जाने का सिर्फ़ एक कारण था—शायद कुछ नया देखने, सुनने, जानने, ढूंढने और महसूस करने को मिलेगा।




महीना है रमज़ान का, रोज़ा है छठवाँ, दिन मंगलवार का। सफ़र की शुरुआत होती है शाम 5:00 बजे से, जिसकी तैयारी मैं और मेरा दोस्त पिछले दो महीनों से कर रहे थे। दोनों के मन में व्याकुलता थी तो एक मित्र-यात्रा की, जिसकी योजना जब हम 11वीं में थे तब बनाया करते थे—साथ में यहाँ घूमेंगे, वहाँ घूमेंगे, पूरी दुनिया घूमेंगे। दुनिया तो शायद हम अभी न घूम पाएँ क्योंकि हम दोनों की जेब में अभी भारतीय नोट न होकर सरकारी इम्तिहानों के प्रवेश पत्र हैं, और वहाँ घूमना इसलिए भी नहीं हो पा रहा क्योंकि घूमने की रकम इन इम्तिहानों के परीक्षा शुल्क ने ले रखी थी। फिर भी हम घर के पैसों में अपना हिस्सा बचाकर आज स्टेशन पर बिना जनरल टिकट के ट्रेन के इंतज़ार में हैं। ट्रेन हमारी उम्मीदों और उत्सुकता को साथ लिए हमारे पास आ जाती है। खाली ट्रेन यह बताने के लिए पर्याप्त थी कि शाम को औद्योगिक तथा व्यापारिक शहरों में जाने वाले लोग सुबह की अपेक्षा कितने कम रहते हैं। यह इस बात की पुष्टि भी करता है कि शहर सिर्फ़ धन के लिए हैं, मन तो सबका अपने गाँव-कस्बे में है।

ट्रेन अब चल पड़ी थी। जनरल बोगी का वह पिछला कोच इतना पीछे था कि विद्युत से चलने वाली ट्रेन के उस डिब्बे में ही कब्र-सा अंधेरा छाया हुआ था। ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार पूंजीवादी युग की इस ट्रेन में गांव और कस्बे तक विकास और पूंजी पहुंचती है। डर हमें अंधेरे का नहीं था—अंधेरा किसे पसंद नहीं? अंधेरे में ही एकांत होता है, सुकून भी हमें अंधेरे में ही मिलता है। चाहे वह नींद में मिलने वाला सुकून हो, घबराहट या डर में आंखें बंद कर लेने का सुकून, या फिर संसार का सबसे अंतिम सुकून: मृत्यु। डर तो हमें अंधेरे में जागने वाली व्यक्ति की सुप्त इच्छाओं से होता है, जो अपराध की भावना को जन्म देती हैं। यह अंधेरा ही है जो चोर को चोरी करने के लिए प्रेरित करता है और अपराधी को अपराध के लिए उकसाता है। रिपोर्टों के अनुसार, संसार में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा अपराध रात के अंधेरे में ही होते हैं। बाकी के 10 फ़ीसदी दोपहर के उजाले में पुलिस स्टेशनों में निर्दोष को दोषी बनाने में, कचहरियों में बेगुनाह को गुनहगार ठहराने में, अस्पतालों में लाशों का इलाज बताने में, दफ्तरों में घूस के नाम पर और संसद व पार्टी कार्यालयों में विकास के झूठे दावों के रूप में होते हैं। रात के अपराध तो मनुष्य के हृदय में थोड़ी देर की इच्छा से उत्पन्न होते हैं,दोपहर के अपराध तो उनके चरित्र में ही रचे-बसे होते हैं—ऐसा चरित्र जो मानव को मानव नहीं समझता, जबकि बच्चों को बच्चा नहीं समझता, महिला को महिला नहीं समझता। समझते हैं तो सिर्फ एक चीज: पावर, पैसा और पोजीशन।


दोबारा अपनी यात्रा पर वापस आते हैं, नहीं तो समाज, राजव्यवस्था और देश पर हम जागृत युवा बिना पानी पिए रात भर चर्चा कर सकते हैं—वह भी भारतीय मीडिया से काफी बेहतर ढंग से। बेतवा और यमुना के संगम को पार करते हुए हमारी ट्रेन अपनी मंजिल के पास पहुंच रही थी। हालांकि यह हमारी अंतिम मंजिल नहीं थी; हमारा लक्ष्य तो वह ट्रेन थी जो दो घंटे बाद कानपुर से छूटने वाली थी। हंसते-खेलते हम दो दोस्त कानपुर पहुंच रहे थे, जो हमारे क्षेत्र का निकटतम औद्योगिक तथा शैक्षणिक केंद्र था।

‘उत्तर भारत के मैनचेस्टर’ के नाम से प्रचलित यह शहर, औद्योगिक बदलाव और एल.पी.जी. (LPG) सुधारों के बाद अब उत्तर भारत का मात्र एक आम शहर बनकर रह गया था। हाल ही में किसी अंतरराष्ट्रीय संस्थान की रिपोर्ट ने इसे दुनिया के सबसे खुशहाल शहरों में से एक बताया था। शायद सर्वे टीम को यह नहीं पता होगा कि कानपुर वाले कुछ भी बोलने से पहले अपने दांत दिखाकर गुटखा थूकते हैं, और उसके बाद ही बात शुरू करते हैं! मजेदार बात यह है कि उसके बाद जब आप उनसे बात करेंगे, तो «अबे भाई!» से लेकर «अबे हटो!» तक के शब्दों को सुनकर आप भी हंसे बिना नहीं रह पाएंगे।

रिपोर्ट ने बिल्कुल सही बताया होगा—यहां के लोग वर्तमान में जीते हैं और हर छोटी बात पर उतने ही खुश होते हैं, जिसके लिए बड़े शहरों में लोग स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर हजारों रुपये खर्च कर देते हैं। फिर भी अगर आपको भरोसा न हो, तो आप खुद यहां आकर अपनी बांछें खिला सकते हैं—वह भी बिल्कुल मुफ्त में!





कानपुर पहुंचकर हम दोनों दोस्त एक ऐसे विश्रामालय में गए जहाँ वे सभी सीटें भरी हुई थीं, जिनके आसपास सुंदर स्त्रियाँ बैठी थीं। इसलिए हम दोनों युवाओं को मजबूरी में एक बुजुर्ग जोड़े के पास ही बैठना पड़ा। मेरे दोस्त का भाग्य इतना अच्छा था कि कुछ देर बाद ही एक सुंदर लड़की सीधे हमारे सामने आकर बैठ गई। अब उसे आकर्षित करने के लिए न तो हम लोगों के पास आईफोन थे और न ही अमेरिकन टूरिस्टर के ट्रॉली बैग, जिनके ऊपर डोमिनोज़ या मैकडोनाल्ड्स के पैक्ड खाने के पॉलिथीन बैग रखे हों। हमारे पास तो सिर्फ एक ही विकल्प था—शिक्षा। इसलिए मैंने निकाली self-help बुक्स, जो मैं अक्सर यात्रा के दौरान साथ लेकर चलता हूँ। इसलिए नहीं कि मैं कोई प्रेमचंद या रस्किन बॉन्ड हूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि भारतीय रेलवे में यात्रा के दौरान इंटरनेट लगभग बंद सा हो जाता है और इतने लंबे सफर में आप अपनी गैलरी देखकर ज्यादा देर टाइम पास नहीं कर सकते। विश्रामालय में लंबा समय बिताने के बाद ट्रेन बस आने ही वाली थी। तब तक हम लोगों ने अपना रात्रिभोज कर लिया था, जो हमारी माताओं ने उतने ही प्यार से बनाकर दिया था, जैसे वे हमें सुबह स्कूल जाते समय दिया करती थीं। काफी देर तक बेवजह किताब पढ़ने का नाटक करने के बाद भी सामने बैठी लड़की ने मेरे दोस्त की तरफ थोड़ा सा भी नहीं देखा—ऐसा मेरे दोस्त ने भी मुझसे कहा। जाते-जाते वह ज़रूर हम लोगों को देख रही थी, शायद यह सोचते हुए कि "अब दोबारा मत दिखना!" असफलता स्वीकार करते हुए हम दोनों उस ट्रेन की ओर बढ़ रहे थे, जो हमें हमारी जिंदगी के सबसे अनोखे पलों का अहसास कराने वाली थी।
आगे के भाग में हम भारतीय रेल के उस सफर के गवाह बनेंगे, जो शहरों को गाँवों से जोड़ता है।

       मिलते हैं अगले भाग में ______| 






Comments

  1. शानदार

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thanx bro 🩵

      Delete
    2. बढ़िया लिखा है भाई।

      Delete
  2. Gjb bhai waiting for part 2

    ReplyDelete

Post a Comment